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न्यायपालिका की चौखट पर गंगा-भक्त

Posted: Wed May 04, 2011 1:04 pm
by janta mat
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देश की स्वाभिमानी पीढ़ी तक शायद यह खबर भी नहीं है कि गंगा के लिए एक संत 2008 में 73 दिन का आमरण अनशन करता है जिसकी वजह से न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर का शिकार होता है। और अब 19 फरवरी से शुरू हुआ उनका आमरण अनशन 27 अप्रैल को पुलिस हिरासत से पूरा होता है। संत निगमानंद ने घोषणा की थी कि अगर उनकी मांगे न मान करके सरकार अगर जबर्दस्ती खिलाने की कोशिश करती है, तो वो आजीवन मुंह से अन्न नहीं ग्रहण नहीं करेंगे।
संत शिवानंद के शिष्य स्वामी यजनानंद 28 जनवरी से अनशन पर बैठे। उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद स्वामी निगमानंद 19 फरवरी 2011 को उत्तराखंड के नैनीताल उच्चन्यायालय के खिलाफ अनशन पर बैठे। उनके अनशन के 68 दिनों के बाद 27 अप्रैल 2011 को पुलिस ने उनको उठा लिया। इतने लम्बे अनशन की वजह से अब उनको आंखों से दिखना बंद हो गया है, अब सुनाई कम पड़ता है और वे बोल नहीं पाते। स्वामी निगमानंद के गिरफ्तारी के बाद फिर से स्वामी यजनानंद ने अनशन जारी रखा है। नैनीताल उच्चन्यायालय के दो जज तरुण अग्रवाल और बी.एस वर्मा को संत शिवानंद और उनके गुरुकुल के लोग खननमाफिया का सहयोगी मानते हैं। संत शिवानंद का कहना है कि गंगा में अनियंत्रित खनन को रोकने के लिए दिए गए उत्तराखंड सरकार के आदेश पर इन जजों ने ‘स्टे आर्डर’ दिया है। नैनीताल उच्चन्यायालय के जज तरुण अग्रवाल का नाम 23 करोड़ रुपये के गाजियाबाद भविष्यनिधि घोटाले में भी आया है। यह सब किया गया है खननमाफिया ज्ञानेश अग्रवाल के वजह से। ज्ञानेश अग्रवाल को ‘नेता-माफिया-अधिकारी’ नेक्सस से आगे का नेक्सस ‘नेता-माफिया-अधिकारी-न्यायपालिका नेक्सस’ का फायदा मिल रहा है।

12 सालों में ग्यारह बार के आमरण अनशन, उत्तराखंड सरकार के तीन बार के खनन बंद करने के आदेश के बावजूद नैनीताल उच्च न्यायालय बार-बार स्टे आर्डर दे रहा है। नैनीताल उच्च न्यायालय को शायद यह पता नहीं है कि सत्य के प्रति आग्रह और प्राणाहूति मातृसदन के संतों को आता है, वे हरिद्वार की गंगा में खनन रोकने के यज्ञ की पूर्णाहूति करके ही मानेंगे।