भारतीय अपने वोट बेचते हैं का मिथक /झूठी बात

Moderators: admin, kmoksha, sumit, MehtaRahulC

Post Reply
admin
Site Admin
Posts: 38
Joined: Wed Nov 04, 2009 9:47 pm

भारतीय अपने वोट बेचते हैं का मिथक /झूठी बात

Post by admin » Tue Jun 21, 2011 9:35 am

भारतीय अपने वोट बेचते हैं का मिथक /झूठी बात
कनिष्ट/जूनियर कार्यकर्ताओं को लोकतंत्र के खिलाफ बनाने के लिए, मीडिया मालिक और कार्यकर्त्ता-नेता जो विशिष्टवर्ग और बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा ख़रीदे हुए हैं , ने झूठी बात बना दी कि नागरिक अपने वोट बेचते हैं | ये लेख ये दर्शाता/बताता है कि कार्यकर्ता जो ये दावा करते हैं कि “भारतीय मतदाता अपने वोट वेचते हैं” या तो गलत सूचित /ग़लतफ़हमी के शिकार हैं या तो सरासर झूठे हैं |
साथ ही , जो प्रजा अधीन राजा /भ्रष्ट को बदलने की प्रक्रिया हमने ने प्रस्ताव की है, वो वैसे भी “भारतीय अपने वोट बेचते हैं” तर्क से प्रभावशून्य(प्रभावित नहीं) है |क्यों? क्योंकि `प्रजा अधीन राजा भ्रष्ट को बदलने` की प्रक्रियाओं में (जैसे प्रजा अधीन-प्रजान मंत्री, प्रजा अधीन-जिला शिक्षा अधिकारी,प्रजा अधीन-मुख्यमंत्री आदि)जो हमने प्रस्तावित की हैं, नागरिक अपने अनुमोदन/मत किसी भी दिन बदला सकता है|
तो यदि प्रत्याशी रु.100 देता है हर नागरिक को , तो नागरिक अगले सप्ताह/हफ्ते फिर से रु.100 मांग सकते हैं या फिर अपना अनुमोदन रद्द करने की धमकी दे सकते हैं | तो प्रत्याशी को रु.100 देना होगा हर मतदाता को हर हफ्ते/सप्ताह , जो व्यावहारिक और लाभकारी नहीं है| इसीलिए प्रस्तावित प्रजा अधीन राजा भ्रष्ट को बदलने की प्रक्रियाएँ “`प्रजा अधीन राजा भ्रष्ट को बदलने की प्रक्रिया` बुरी है क्योंकि भारतीय अपने वोट बेचते हैं “ तर्क से प्रभावशून्य(प्रभावित नहीं) है| फिर भी, मैं इस झूठी बात का खंडन करूँगा साथी भारतीय नागरिकों का सम्मान बचाने के लिए |
=====
शुरुवात के लिए ,यहाँ 4 बुनयादी जवाबी-तर्क प्रस्तुत हैं-
1.पहला, मीडिया मालिकों ,कार्यकर्त्ता-नेताओं से पूछें “ लगबग कितने प्रतिशत नागरिक अपने वोट बेचते हैं “ और वो उसका सही उत्तर नहीं दे पाएंगे| एक बयान जैसे “भारतीय अपने वोट बेचते हैं “ यदि सही है, नापा जाने योग्य होना चाहिए | क्या वो 90% है या केवल 5% है?
2.दूसरा, ये सत्य है कि प्रत्याशी पैसा और उपहार देते हैं और मतदाता उन्हें स्वीकार करते/लेते हैं |लेकिन हर मतदाता ये जानता है कि मतदान गोपनीय है | इसिलिय कुछ भी उसे नहीं रोकेगा अपना वोट देने से उस व्यक्ति को जिसे वो अपना वोट देना चाहे |
3. और तीसरा, जो ये दावा करते हैं “ भारतीय अपने वोट बेचते हैं ”, अक्सर ऐसा भी दावा करते हैं कि “ भारतीयों के कमजोर नैतिक मूल्य हैं “. यदि मतदाता के कमजोर नैतिक मूल्य हैं, तो कुछ भी उसको रोक नहीं सकता पैसे लेने से `क` से और `ख` को वोट देने के लिए | लेकिन तब एक बयान आता है “ मतदाता अपना वचन/वादा रखते हैं ”| अभी दोनों बयान सही नहीं हो सकते |
4. और अंत में, मैं विनती करता हूँ सभी से एक प्रश्न पूछने के लिए जो ये दावा करते हैं “ `य` प्रतिशत भारतीय मतदाता अपने वोट बेचते हैं “| उनसे पूछें,”कितने प्रतिशत आपके अनुसार फैसले बेचते हैं”, “कितने प्रतिशत मीडिया मालिक समाचार बेचते हैं” और “कितने प्रतिशत बुद्धिजीवी महत्वपूर्ण सत्य को छिपाते हैं ?” क्या ये `य` से अधिक है या `य` से कम है? आप देखेंगे कि जो हम आमजन पर दोष लगाते हैं वोट बेचने के लिए , मना कर देते हैं आमजन और विशिष्ट वर्ग के इमानदारी के स्तर के बीच तुलना करने के लिए |
=====
अब मैं इस झूठी बात कि “ नागरिक वोट बेचते हैं” का खंडन कुछ उदहारण से करूँगा -
A. गुजरात विधानसभा चुनाव-2007 में , एक धनिक ,जिसका नाम `भुवन भरवाड` एक कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में नादियाड से लड़ रहा था | वो हार गया | साथ ही , कांग्रेस प्रत्याशी, नरहरी अमीन मटर चुनाव-क्षेत्र से लड़ रहा था| अमीन पूर्व मंत्री था और धर्मार्थ न्यासों के माध्यम से विशाल भूखंडों का मालिक है और उसने भारी मात्र में धन खर्च किया था , फिर भी चुनाव हार गया |
B. 1977 में कांग्रेस के पास जनता पार्टी से 10 गुना अधिक पैसे था ,फिर भी जनता पार्टी जीत गयी और कांग्रेस हार गयी| 1988 में कांग्रेस के पास भाजपा से 10 गुना अधिक पैसा था, फिर भी कांग्रेस हार गयी और भाजपा/एन.डी.ऐ जीत गयी|
C. बहुत मामलों में, सभी प्रमुख प्रत्याशी पैसे देते हैं| क्या मतदाता हमेशा उसी व्यक्ति के लिए वोट करती है जो सबसे अधिक पैसा का भुगतान करता है? मुझे शक है | और अक्सर मामले होते हैं जहाँ मतदाता उस प्रत्याशी के लिए वोट करते हैं जिसने कुछ नहीं भुगतान किया |
अनगिनित अन्य उधाहरण हैं |
====
ये सही है की बहुत प्रत्याशी पैसे और उपहार देते हैं | और ये भी सही है कि मतदाता उसे लेते हैं | बहुत कम गरीब व्यक्ति रु.100 को मना करेंगे और कोई ही अमीर आदमी एक लाख रुपये मना करेगा | एक संपन्न व्यक्ति की ऊँची कीमत होगी ---- बहुत कम मुफ्त के पैसे को ना कहेंगे | लेकिन प्रश्न ये है --- क्या मतदाता ने `क` के लिए वोट किया क्योंकि `क` ने पैसे दिए या क्योंकि उसे `ख` से घृणा/नफरत थी और कि उसे `क` पसंद था ? उत्तर है --- 90% से अधिक ने `क` के लिए वोट किया क्योंकि वे `क` को पसंद करते थे या `ख` से नफरत करते थे , ना कि क्योंकि `क` ने उसे पैसे दिए |
जो व्यक्ति ये कहता है “ भारतीय वोट बेचते हैं”, उसको मैं ये दो प्रश्न पूछूँगा-
1. मानो आप एक प्रत्याशी को नापसंद करते हो और वो आप को रु.100 देता है| क्या आप उसको मना करोगे? यदि वो आपको एक लाख रुपये दे , तो क्या आप फिर भी उसको मना करोगे? यदि कोई व्यक्ति कहता है कि वो एक लाख रुपये लेने से मना करेगा तो मैं उसे या तो अत्यधिक नैतिक या अत्यधिक पाखंडी का पद दूँगा |
2. यदि व्यक्ति सहमत हो जाता /मान लेता है कि वो पैसे स्वीकार कर लेगा , तब अगला प्रश्न ये है : क्या फिर भी वो प्रत्याशी के लिए वोट करोगे जिसको तुम नापसंद करते हो ?
दूसरे शब्दों में, ये देखते हुए कि मतदान गोपनीय है,मतदाता को कोई अनदेखे परिणाम का कोई खतरा नहीं है | क्योंकि मतदान गोपनीय है, ये आरोप लगाना कि उस व्यक्ति ने किसे वोट दिया , पता लगाना संभव नहीं और ये आरोप लगाना कि आम जन वोट के लिए विक गए सही नहीं है | और इस प्रकार के धंधों में कोई बाध्यता नहीं है | ये ही कारण है कि इतने सारे धनिक/अमीर प्रत्याशी लोकप्रिय, कम धनी प्रत्याशियों के विरुद्ध/खिलाफ हार जाते हैं |
तो फिर यदि पैसे मायने नहीं रखते तो फिर प्रत्याशी भुगतान क्यों करते हैं /पैसे क्यों देते हैं ? क्योंकि यदि प्रत्याशी अमीर है और बेईमान भी और फिर भी वो कुछ भी नहीं देता , तो मतदाताओं के मुंह का स्वाद/जायका जरुर बिगड जायेगा | लेकिन यदि प्रत्याशी/पार्टी ईमानदार और नेक है , तो मतदाता कभी भी पैसे की आशा नहीं करेगा| यदि प्रत्याशी/पार्टी भ्रष्ट है , उनके लिए बेहतर है कुछ पैसे दें मतदाताओं को | लेकिन ये उन प्रत्याशियों पर लागू नहीं होता जो भ्रष्टाचार कम करने के लिए प्रतिबद्ध हैं|
अंत में , नए प्रत्याशी और नयी पार्टियां क्यों नहीं जीतते ? क्योंकि मतदाताओं ने दल और प्रत्याशी पिछले 60 सालों में पांच बार तक बदले हैं | राष्ट्रिय स्तर पर, ये दो बार हुआ 1977 और 1988 में | उत्तर प्रदेश में नागरिकों ने 3 नयी दल-भाजपा, सपा, बसपा को आजमाया है | गुजरात में , पहले मतदाताओं ने जनता दल और फिर भाजपा को आजमाया है | हर बार , भ्रष्टाचार 1% भी कम नहीं हुआ | कारण है ---- नागरिक के पास भ्रष्ट को बदलने/निकालने/अस्वीकार करने का अधिकार नहीं है(प्रजा अधीन राजा) और इसीलिए नए प्रत्याशी छे महीनों में बिक जाते हैं | अब तो अतीत के तथ्य के आधार पर एक धारणा बन गयी है --- नए प्रत्याशी बिक जाएँगे , इसीलिए समय,प्रयास क्यों व्यर्थ करें नए प्रत्याशी के पर्चे और उसका जीवनी विवरण/बायोडाटा पढने में ? तो नए उम्मीदवारों और नई पार्टियों को पिछले बुरे अनुभवों की वजह से अविश्वास का सामना करना पड़ता है , किसी भी अन्य कारण की वजह से नहीं|
यदि वोट इतनी आसानी से बिकते , तो मुकेश अम्बानी अपनी पार्टी बना लेते और अपने 500 कटपुतली को जितवा देते और प्रधान मंत्री बन जाता बजाय कि सांसदों को खरीदने के | परन्तु ये तथ्य कि मुकेशभाई को सांसद खरीदने पड़ते हैं , ये दिखाता है कि वो वोटरों को खरीद नहीं सकता |

Post Reply

Return to “भारत के बिकाऊ बुद्धिजीवियो, राजनितिक पक्ष, मीडिया तथा समाचार पत्र का सफ़ेद झूठ – Paid and Misleading Information provided by Paid Intellectuals, Media, Political Parties & News Papers of India”