प्रजा अधीन राजा समूह | Right to Recall Group

अधिकार जैसे कि आम जन द्वारा भ्रष्ट को बदलने/सज़ा देने के अधिकार पर चर्चा करने के लिए मंच
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SR. No. Author Message
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PostPosted: Sun Jul 24, 2011 9:07 am 
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भारत के कहे जाने वाले हाई-कोर्ट और सुप्रीम-कोर्ट के जज भ्रष्ट नहीं हे का मिथक/जूठी बात



भारत के कहे जाने वाले कु-बुद्धिजीवियों ने और एक मिथक फैला के रखा हे की भारत की हाई-कोर्ट और सुप्रीम-कोर्ट साफ-सुतरी हे और उसमे कोई भ्रस्टाचार की गुंजाईश भी नहीं हे |



और इस मिथक को तोड़ने के लिए हम आपको एक सूत्र देते हे | हाई-कोर्ट और सुप्रीम-कोर्ट भ्रष्ट हे की नहीं वो जानने के लिए वो मीडिया में कोनसा स्टेटमेन्ट या कथन करते हे या समय बर्बाद करने के लिए कोनसी नोटिस देते हे उसपे ध्यान ना करे बल्कि वो कोनसा कार्य करते हे उसपर ध्यान दे |



अगर आपने पिछले ६० सालो का अध्ययन किया होगा तो आपको पता चलेगा की जभी भी कोई बड़ा भ्रस्टाचार का गोटाला हुआ हे तो सुप्रीम कोर्ट ने समय व्यर्थ करने के लिए कोई बेकार नोटिस सरकार के खिलाफ जारी कर दी होंगी लेकिन उस भ्रष्ट सरकार के खिलाफ पिछले ६० सालो में उस नोटिस के बाद भ्रष्ट सुप्रीम कोर्ट के जज ने कोई भी कार्यवाही नहीं की हे | बस वो नोटिस पे नोटिस जारी करके मासूम नागरिको का ध्यान भ्रस्टाचार से अलग मुद्दों पे खीचते हे और ईसी तरह समय व्यर्थ करते हे जेसे अंग्रेजो के खिलाफ आज़ादी संग्राम में मोहनभाई ने लोगो को अहिंसा के मार्ग पर दोर के और १०० किलोमीटर प्रति घंटा के हिसाब से चरखा चलके भारत के लोगो के समय व्यर्थ किया था | सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज हमें यह केह रहे हे की हम अपनी तरफ से सब कुछ संभाल लेंगे लेकिन आम नागरिको को कुछ भी करने की जरुरत नहीं हे | लेकिन आम नागरिको को राईट टू रिकोल सुप्रीम कोर्ट जज और कोर्ट में जज प्रणाली हटाकर ज्यूरी प्रणाली लाने की मांग करनी चाहिए |



अब हम सुप्रीम-कोर्ट, हाई-कोर्ट और लोअर-कोर्ट का भ्रस्टाचार साबित करने के लिए कुछ तथ्य रखते हे



(१) भारत के पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण जी ने २०१० में सुप्रीम-कोर्ट में एक शपथ-पत्र (हलफ़नामा या एफिदेवित) डाली जिसमे उन्होंने भारत के १६ सुप्रीम कोर्ट के जज के नाम दिए और लिखा की उनमेसे ८ जज पूरी तरह से भ्रष्ट हे |

- तो क्या अगर बाकि के ८ जज ईमानदार हे तो वो बाकि के ८ भ्रष्ट जजो के नाम प्रकाशित क्यों नहीं करते ? (अगर बाकि के ८ जज इमानदार हे तो ?)

- अगर कानून मंत्री शांति भूषण जी ने ऐसा लिखा हे की १६ में से ८ जज ही भ्रष्ट हे तो असल में कितने जज भ्रष्ट होंगे | यह तो केवल एक सरकारी नंबर हे असल नंबर कितने होंगे उसका अंदाज़ा आप खुद लगाईये ?

(Justice Rangnath Mishra, Justice K.N. Singh, Justice M.H. Kania, Justice L.M. Sharma, Justice M.N. Venkatachalliah, Justice A.M. Ahmadi, Justice J.S. Verma, Justice M.M. Punchhi, Justice A.S. Anand, Justice S.P. Bharucha, Justice B.N. Kirpal, Justice G.B. Pathak, Justice Rajendra Babu, Justice R.C. Lahoti, Justice V.N. Khare and Justice Y.K. Sabharwal.)

जिन जज की यादी शांति भूषण जी ने दी थी वो ऊपर हे |



(२) अगर भारत की सुप्रीम कोर्ट भ्रष्ट नहीं हे तो भोपाल गैस कांड का फेसला आने में २५ (पच्चीस) साल से ज्यादा क्यू लग रहे हे | और अभी भी फेसला आया नहीं हे और अपराधी को सजा भी नहीं हुई हे | सुप्रीम कोर्ट कहेगी की वो बाकि काम में व्यस्त हे तो क्या भारत का कोई भी मुद्दा भोपस गैस कांड से बड़ा हो सकता हे ?



मेने ऊपर अनुरोध किया था की सुप्रीम और हाई कोर्ट के जज जो काम करे उसके ऊपर से निष्कष निकाले नाकि सुप्रीम और हाई कोर्ट के जज जो बकवास करे | बकवास करने के लिए उन्होंने काफी सारी नोटिस जारी कर दी हे भोपस गैस कांड के अपराधी के खिलाफ लेकिन मुख्य आरोपी “वोरन एंडरसन” भारत छोडके १९८४ में ही भाग गया था और भारत की सुप्रीम कोर्ट ने उसे भारत लाने के लिए कुछ भी नहीं किया | सिर्फ बकवास नोटिस जारी कर दी और भ्रष्ट मीडिया ने यह केहना शुरू किया की सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी कर दी हे | नोटिस जारी करने से क्या होगा ? कांग्रेस भी नोटिस पे नोटिस जारी करती हे और कांग्रेस कितनी ईमानदार हे सबको पता हे | और आज तक भोपस गैस कांड के अपराधी को सजा मिलने की बात तो दूर, भोपाल गैस कांड में पीड़ित लोगो को मुआवजा भी नहीं मिला हे भारत के ईमानदार सुप्रीम कोर्ट के ईमानदार जज की मेहरबानी से | भारत की आज़ादी के ६५ साल की आज़ादी के इतिहास में सुप्रीम कोर्ट के लिए भोपाल गैस कांड से बड़ा कोई आपराधिक मामला हे या नहीं आप ही बताईये ?



(३) आज कल जिस स्विट्जरलैंड और मोरीसीयस रूट (मार्ग) को लेकर भ्रस्टाचार की चर्चा हो रही हे उस में भ्रस्टाचार में मोरीसीयस रूट (मार्ग) के उपयोग का अंदेशा क्रान्तिकारी राजीव दिक्सित जी को साल २००२ में यानि १० साल पेहले ही आ चूका था और उन्होंने भारत के सुप्रीम कोर्ट में सन २००२ में मोरीसीयस रूट (मार्ग) को लेकर जनहित याचिका डाली थी | जिसमे उन्होंने कहा था की भ्रस्टाचार से कमाए गए पैसे मोरीसीयस रूट (मार्ग) भारत में वापस निवेश हो रहे हे और यह मोरीसीयस रूट (मार्ग) को बंध करना चाहिए | लेकिन १० साल हो गए लेकिन भ्रष्ट सुप्रीम-कोर्ट के जज ने आज तक कुछ भी नहीं किया | सिर्फ समय व्यर्थ किया |

उदहारण : सी.बी आई. का मानना हे की ए. राजा ने घुंस लेने के लिए अपनी बीवी का मोरीसीयस बैंक अकाउंट का इस्तमाल किया था |

http://articles.timesofindia.indiatimes ... ribe-money




(४) मार्टी दम्‍पत्ति को दिसंबर, 2000 में तब रंगे हाथों गिरफ्तार किया गया था, जब वे गेटवे ऑफ इंडिया से उठाकर लाई गई अवयस्‍क लड़कियों के गन्‍दे चित्र उतार रहे थे। स्‍विटजरलैण्‍ड के इस दम्पत्ति के द्वारा अवयस्‍क लड़कियों के बाल यौन (शोषण) अपराध की भयानक कहानी मुंबई के एक सेशन कोर्ट को कैमरे के जरिए/इन कैमरा बताई गई। और मार्च, 2003 में अतिरिक्‍त सेशन जज मृदुला भटनागर ने इस दम्‍पत्‍ति को सजा सुनाई। उन्‍हें सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। इस सजा के खिलाफ उनकी अपील का ही नतीजा था कि मुंबई उच्‍च न्‍यायालय ने उनकी दलील को स्‍वीकार किया कि यदि इस मामले की सुनवाई तेजी से नहीं होती तो उनकी अपील 7 वर्षों के बाद भी सुनी नहीं जाती जो मुख्‍य तौर पर उनके सजा की अवधि थी। जज ने उन्‍हें प्रत्‍येक पीड़ित को एक-एक लाख रूपए का बड़ा हरजाना भरने का भी निर्देश दिया। उनके अपराध की गहराई का उल्‍लेख पूरे निर्णय/फैसले में कहीं पर भी नहीं किया गया था।



उनके पासपोर्ट से यह खुलासा हुआ कि वह दम्‍पत्ति वर्ष 1989 से ही हर वर्ष भारत आया करता था। वे कई देशों में अपना धन्‍धा चलाते थे और उनके लैपटॉप बच्‍चों की तस्‍वीरों से भरे पड़े थे जिसमें श्रीलंका और फिलिपिन्‍स के भी बच्‍चे थे। स्‍वयं को अकेला बुजुर्ग दम्‍पत्‍ति बताकर वे गली के बच्‍चों और उनके माता-पिता से दोस्‍ती करते थे और उन्‍हें दान की आड़ में खुशहाल जिन्दगी का वायदा करते थे। श्री मार्टी (जिसने स्‍वयं को एक बहुराष्‍ट्रीय दवा कम्‍पनी में महा-प्रबंधक/मेनेजर बताया था) और उसकी पत्‍नी, दोनों के पास से चिकनाई वाले पदार्थ/लुब्रिकेन्‍ट्स, कंडोम और लिंग के उपर छिड़काव करने वाले स्‍प्रे पाए गए थे। लिली मार्टिन एक प्रशिक्षित नर्स थी जो उत्‍पीड़न के शिकार बच्चों के घाव की दवा–पट्टी करती थी। लेकिन साक्ष्‍य के रूप में रिकार्ड की गई इन बातों में से किसी भी बात का उल्‍लेख मुंबई उच्‍च न्‍यायालय के फैसले में नहीं किया गया। उच्‍चतम न्‍यायालय की बेंच जिसके अध्‍यक्ष मुख्‍य न्‍यायाधीश वी. एन. खरे थे, उन्‍होंने 5 अप्रैल, 2004 को दिए गए अपने फैसले में इन बाल अपराध के दोनों दोषियों को जमानत दे दी ..... “



भारत के मुख्‍य न्‍यायाधीश श्री खरे से जमानत मिल जाने के बाद दोनों धनवान स्‍विट्जरलैण्‍ड-वासी बाल यौन-शोषण अपराधी भारत से बच निकले। इस प्रकार के जमानत के आदेश ने पुलिसवालों और निचली अदालत के जजों/न्‍यायाधीशों के मनोबल गिरा दिए। उन्‍होंने अवश्‍य ही यह सोचा होगा कि अपराधी को सजा दिलाने का उनका प्रयास बेकार गया। और उन्‍हें इस बात का मन में दुःख भी रहा होगा कि घूस दिए जाने के प्रस्‍ताव को उन्‍होंने क्‍यों ठुकरा दिया। मुंबई उच्‍च न्‍यायालय के जज/न्‍यायाधीश द्वारा छोड़ दिए जाने का आदेश संविधान के खिलाफ था। और मुख्‍य न्‍यायाधीश/जज प्रधान `खरे` द्वारा दोनों धनवान स्‍विट्जरलैण्‍ड-वासी बाल अपराध के दोषियों को दिया गया जमानत का आदेश भी संविधान का घोर उल्‍लंघन था। संविधान के ऐसे उल्‍लंघन इसलिए होते हैं कि हम नागरिकों के पास संविधान का उल्‍लंघन करने वाले न्‍यायाधीशों/जजों/न्‍यायाधीशों को बर्खास्‍त करने/हटाने की कोई प्रक्रिया नहीं है।



(५) `ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल` के एक सर्वेक्षण में “जज और कोर्ट” को पुलिस के बाद दूसरा सबसे भ्रष्ट बताया |



(५) तहेल्का के कांड में जो-जो भ्रष्ट नेता पकड़ा गया था उनमेसे आज-तक सुप्रीम और हाई कोर्ट ने कोई सजा नहीं दी हे | उनमे सारे भ्रष्ट नेता केमेरे के सामने पुरे नंगे हो चुके थे लेकिन फिर भी आज तक किसी को सजा नहीं हुई हे |



उपाय



(१) राईट टू रिकोल सुप्रीम कोर्ट जज - अधिक जानकारी के लिए नीचे दी गयी फाइल में अध्याय ७ देखिये

(२) सुप्रीम कोर्ट में जज प्रणाली को हटाकर ज्यूरी प्रणाली लाई जाये – अधिक जानकारी के लिए नीचे दी गयी फाइल में अध्याय २१ देखिये

( http://righttorecall.com/301.h.pdf

)


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