प्रजा अधीन राजा समूह | Right to Recall Group

अधिकार जैसे कि आम जन द्वारा भ्रष्ट को बदलने/सज़ा देने के अधिकार पर चर्चा करने के लिए मंच
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PostPosted: Thu May 19, 2011 1:28 pm 
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Joined: Sun Sep 12, 2010 2:49 pm
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भारत के अमीर वर्ग की गलतफहमी से उनके जनसाधारण-समर्थक कानूनों का विरोध

भारत बहुराष्ट्रीय कंपनी का दास या गुलाम बनने की रह पर है| पहले से ही बहुराष्ट्रीय कंपनी 50% या अधिक तो कामयाब (सफल) हो गयी है| बहुराष्ट्रीय कंपनी ने पूरी तरह से भारत को प्रौद्योगिकी/तकनीकी क्षेत्र में उनपर निर्भर बना दिया है , कृषि या खेती में आंशिक रूप से एवम रक्षा, सैन्य और युद्ध क्षेत्र में अपने ऊपर पूरी तरह से आश्रित या आधीन कर लिया है|

भारत में पैसेवाला विशिष्ट वर्ग का बहुमत ,आम नागरिको का अहित करने वाले कानूनों जैसे कि `पारदर्शी शिकायत प्रणाली के बिना जन-लोकपाल` का समर्थन करके तथा `भ्रष्ट अधिकारी को नौकरी में से निकालने की प्रक्रिया` (राइट टू रिकोल)(चैप्टर 6, http://www.righttorecall.info/301.pdf देखें) का विरोध करके, कोर्ट, न्यायलय/कोर्ट में आम नागरिकों द्वारा भ्रष्ट को सजा देने का अधिकार (ज्यूरी सिस्टम)(चैप्टर 21 देखें), `नागरिक और सेना के लिए खनिज रोयल्टी`(चैप्टर 5 देखें) का विरोध करके बहुराष्ट्रीय कंपनी की यह दासता (गुलामी) आगे बढा रहे हैं|

हम मानते हैं की भारत में ऊपर का 5% पतिशत, पैसेवाला ,विशिष्ट वर्ग का बहुमत यह सब भारत के गरीब लोगों को दबाकर रखने के लिए कर रहा है जिससे उन पैसे वाले लोगों को सस्ते दाम पर काम या नौकरी करने वाले लोग मिलें और उनका शोषण कर सके जिससे उनकी आने वाली पुश्तें आराम से जी सकें लेकिन पैसेवाला बहुमत वर्ग की यह सोच एक दम गलत है और ये उनकी गलतफहमी है ये दिखाना चाहेंगे |

चलिए दो स्थितियों के बारे में बात करते हैं -

(1) अगर भारत में ऊपर का 5% पतिशत पैसेवाला,विशिष्ट वर्ग का बहुमत आम नागरिक के हित करने वाले कानूनों का समर्थन करे-

इस परिस्थिति में भारत के सामान्य नागरिकों को शक्ति मिल जायेगी और भ्रष्टाचार तथा गरीबी कम हो जायेगी| इस परिस्थिति में पैसेवालों को कुछ भी खोना नहीं पड़ेगा | उनकी जीवन शैली वेसी ही रहेगी | कोई भी पैसेवाला गरीब लोगों का शोषण किये बिना भी अपनी समृद्ध जीवन- शैली जी सकती है | अंबानी सात माले के अपने महेल में ही रहेंगे सिर्फ उनको थोडा सा ही टेक्स ज्यादा देना पड़ेगा क्योंकि संपत्ति कर तथा एम.आर.सी.एम. के कानून आ जाएँगे| उनको बडी आसानी से नौकरी करने वाले लोग मिल जायेंगे ,सिर्फ अंतर यही होगा की वो बहुत सस्ता/कौडियों के मोल नहीं मिलेगा | ज्यूरी सिस्टम तथा राईट टू रिकोल न्यायाधीश, मंत्रियो, पुलिस पर आने से कोर्ट के हालात में सुधार होगा | वो आम नागरिकों का शोषण नहीं कर पाएंगे लेकिन उनकी अमीरी में कोई अंतर नहीं पड़ेगा |

(2) अगर भारत में ऊपर 5% पतिशत पैसेवाला,विशिष्ट वर्ग का बहुमत आम नागरिक के हित करने वाले कानूनों का विरोध करते हैं और बहुराष्ट्रीय कंपनीओ द्वारा हो रही लूट को सक्रीयता/निष्क्रियता से समर्थन करेगा तो भारत बहुराष्ट्रीय कंपनियों की गुलाम हो जायेगा-

भारत फिर से गुलाम हो जायेगा| बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अंग्रेजों की तरह ही भारत को लूटेंगी| गरीब और गरीब हो जायेगा | लाखों लोग मर जायेंगे | लेकिन यह बहुराष्ट्रीय कंपनी अधिकतर अमीर लोगों को भी नहीं छोड़ेंगी | बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अमीर लोगो की कोई सगी नहीं हैं कि उनको छोड़ दे| अगर भारत फिर से बहुराष्ट्रीय कंपनीओ का गुलाम बन गया तो वो किसी भी समय अंबानी की सात माले के महल छीन सकती हैं और वो अंबानी को मजबूर करेगी की उनको ज्यादा कर/टैक्स भरना पड़े | पैसा ही अपराधियों तथा बहुराष्ट्रीय कंपनी का जाति या धर्म है | भारत में रोजगार बिलकुल भी न मिले ऐसा हो सकता है , अराजकता में इतनी वृद्धि होगी कि ईमानदार व्यक्ति नहीं मिलेगा, कोर्ट तथा पुलिस बहुराष्ट्रीय कंपनी की गुलाम बनकर कुछ कानून और व्यवस्था संभाल नहीं पाएगी | सब जगह गुंडा-राज होगा और अधिकतर पैसे वाले लोगों को ही उसमें ज्यादा भुगतना पड़ेगा क्योंकि उनके पास पैसा है |

इस तरह जनसाधारण-समर्थक कानूनों का विरोध करके, और जनसाधारण को कमजोर बनाकर ,भारत के पैसे वाले लोग बहुराष्ट्रीय कंपनीओ के दोस्त बन रहे हैं, लेकिन यह दोस्ती ज्यादा नहीं चलेगी| जैसे ही बहुराष्ट्रीय कंपनीओ के पास सेना, पुलिस तथा कोर्ट पर नियंत्रण आ जायेगा तो इन पैसे वाले लोगों को भी लूट लेंगे और कमजोर सेना और आम नागरिक भी देश की रक्षा नहीं कर पाएंगे | क्या यह पैसे वाले लोग बहुराष्ट्रीय कंपनियों से खुदको लुटने से बचा पाएँगे ? क्या एक आध परिवार के अलावा कोई बच पाएगा ? कोरिया, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, फिलिपाईन्स, इराक इसके जिवंत उदाहरण हैं जहा पर इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अमीर तथा गरीब किसी वर्ग के लोगों को नहीं छोड़ा |

पहले अंग्रेजों ने `फूट डालो और राज करो` की निति अपनाई, अभी यह बहुराष्ट्रीय कंपनी भारत के अमीर तथा गरीब वर्ग के बीच में वो ही निति अपना रहे हैं |

अभी यह भारत के अमीर लोगों पर है की वो कौन सी परिस्थिति देखना चाहते हैं तथा वो आम-नागरिक-समर्थक सामान्य कानूनों जैसे कि पारदर्शी शिकायत प्रणाली/सिस्टम (चैप्टर 1, http://www.righttorecall.info/301.pdf), `नागरिक और सेना के लिए खनिज रोयल्टी`(एम.आर.सी.एम)., राईट टू रिकोल(आम नागरिकों का भ्रष्ट को बदलने का अधिकार )(चैप्टर 6) के ड्राफ्ट , ज्यूरी सिस्टम (भ्रष्ट को सज़ा देने का आम नागरिकों का अधिकार) (चैप्टर 7,21) का विरोध या समर्थन करते हैं |

नोट – हमें कोई भी अमीर से या किसी और से ,किसी भी प्रकार के दान की आवश्यकता नहीं है | सिर्फ सभी लोगों का कुछ समय चाहिए ये सब कानूनों का प्रचार करने के लिए | हम दान के सख्ती से खिलाफ हैं |

कृपया आप अपनी राय हमारी फोरम याने की वार्तालाप करने के लिए मंच पर दे.

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India`s richs` misconceptions in opposing pro-common laws

India is on way to getting enslaved by MNC. Already MNCs have succeeded 50 % in this. They have made India dependent on MNCs for technology fully, agriculture partly , defence fully, education mostly. And the majority of the elite rich are furthering this cause by supporting anti-common laws like Janlokpal bill without transparent complaint procedure and opposing transparent complaint/proposal procedure,right to recall drafts, MRCM drafts,jury system etc.

I assume the India`s rich are doing this to keep the common people who are mostly poor suppressed. So, that they think they can get cheap labour who they can exploit.And their and their future generations can live `comfortably`.

But would like to point out this is a misconception of the India`s rich.

Let us take two situations-

(1) The India`s rich support the pro-common laws-

India`s commons will be empowered , corruption and poverty will reduce. BUT the rich do not have to suffer because of that in anyway. Their lifestyle can go on. One can live a rich lifestyle even without exploitation of the commons. Ambani`s can still live in seven storied buildings although they will have to pay more taxes since wealth tax and MRCM will come. They will get labour still although maybe not dirt cheap.Jury system and right to recall laws over judges, ministers,etc will improve situation of courts ,police. They will not be able to exploit the commons. That is all the difference it will make.

(2) The India`s rich oppose the pro-common laws and actively/passively support the MNCs looting and enslaving of India-
India will be enslaved. The MNCs will loot all of India (just like Britishers) . The poor will become more poor. Lakhs will die. BUT the MNCs will also loot the majority of the rich persons also. They are not relatives that they will spare them. They can snatch Ambani`s seven storied building and the factories and offices of the rich ANYTIME , force them to pay more taxes and no caste or religion will be spared.Money is only religion and caste of the criminals in reality. Labour might not be available at all , lawlessness will increase so much that they will not get honest people, Courts, police will be out of order themselves and will not be able to maintain law and order. There will be gundaraj and lawlessness and majority of rich will also suffer.
So, by making the common people weak, they are befriending the MNCs but the MNCs will NOT be their friends for long.They themselves will be exploited by MNCs.

The Britishers played police of `Divide and rule`, now the MNCs are playing the same police of `Divide the commons and the rich and rule the country.`

So, it is for the rich now to decide which situation they would like and whether they want to support or oppose pro-common laws like transparent complaint/proposal procedure (http://www.righttorecall.info/001.pdf), MRCM, Right to recall drafts and jury system (chapters 5,6,7,21 of http://www.righttorecall.info/301.pdf)

NOTE- NO DONATIONS ARE EXPECTED FROM THE RICH OR ANYONE ELSE, ONLY EVERYONE`S TIME IS REQUIRED FOR PROMOTING THESE LAWS. WE STRICTLY OPPOSE DONATIONS.

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PostPosted: Tue Jun 28, 2011 2:36 pm 
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Joined: Sun Sep 12, 2010 2:49 pm
Posts: 596
It is democracy alone which can make us rich.

US is rich NOT because of capitalism, but because democracy.

For that matter, many Latin American countries adopted capitalism and failed.
Neither capitalism nor communism will work for poor and hard-working.

ONLY democracy will work for poor.
Mexico's democracy is as weak as India. Compare with US : the people in US elect district police chiefs, public prosecutors, judges in many states, district education officer and above all, use JURY SYSTEM.

Wherein, all these democratic administrative procedures are absent in Mexico.

So on a scale of 1-10 of democracy, say US is 7, then Mexico is below 2, and so is India.
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economic freedom is NOT possible unless political inequalities are low.

The political freedom is outcome of low political inequalities. When politicai (and administrative ) inequalities are high, the political freedom is low, and so is economic freedom. The politically powerful ones, such as neta, babu, judges, IPS etc and elitemen who have nexuses with them will usurp the wealth of commons. And with wealth, the economic freedom will also disappear.

eg in India, the political inequalities are high. So neta-babu-judges-IPS-elitemen are now confiscating lands using SEZ mantra. Now how much is economic freedom left with the guy who lost is land and got peanuts? And likewise, SEZs wont pay taxes and so tax burden on commons living outside will increasem, which will reduce their economic freedom

And all this is result of high political inequalities

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Suffices to say, economic freedom is SYMPTOM of an administrative setup where political inequalities are low. With high political inequalities, economic freedom is a pipe dream.

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IOW, democracy results into a prosperous economy which economists mistakenly label as capitalism. In reality, its label should have been 'Outcome of Democracy'.
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When 'legal system' (which is again a symptom of political system) is oligarchic, a handful of oligarchs control everything and so they start usurping wealth of us commons using regressive taxes etc. So as commons become poor, their productivity falls and industrialization of nation also falls behind, and so the nation becomes dependent on other nations.

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Due to our courts, small gunuine industrialists suffered, and only those good in bribe giving and wheeling-dealing could come up. These wheeler-dealers had no technical knowout and so could not build even one company that can match Sony or Mincrosoft or Intel of Japan, US etc. Which is why India is dependent on US, Japan etc.
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But that does not negate the importance of economic freedom.

It does. As political inequalities in administration, courts etc reduce, the economic freedom AUTOMATICALLY increases. As I said, so called economic freedom is a mere SYMPTOM of low political inequality. The so called economic freedom doesnt even warrant a mention in dictionary as it is a mere unavoidable and guaranteed result of low political inequality.

The SEZ example you quote is a case of govt interference and is hence not an example of a FREE MARKET. Let there be open bidding for SEZs.

Govt interference is MUST. Without Govt interference, criminals will control all the wealth. The question is --- MINIMAL and FAIR interference. That is achieved ONLY when political inequality is low. Lower the political inequality, lesser the interference.

The SEZ is result of extreme political inequality. We commons have no procedures to expel SCjs, HCjs, PM, MPs etc. So judges, Ministers etc are siding with elitemen in looting the lands of us commons and imposing regressive taxes. SEZ is a label for these land grab and regressive taxes.


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