अंग्रेजो ने मोहनभाई को पैसे देने की इज़ाजत क्यों दी ?

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अंग्रेजो ने मोहनभाई को पैसे देने की इज़ाजत क्यों दी ?

Post by RightToRecallGroup » Fri Jul 01, 2011 7:46 am

अंग्रेजो ने टाटा, बिरला, साराभाई आदि व्यापारियों को मोहनभाई को पैसे देने की इज़ाजत क्यों दी ? दूसरे शब्दों में क्या मोहनभाई(मोहनदास करमचंद गाँधी) को अंग्रेजो ने पैसे दिए थे ?

सारांश :
अंग्रेजो ने भारत के उस वक्त के जाने माने व्यापारियों को यह इज़ाज़त दे दी कि वो लोग मोहनभाई(मोहनदास करमचंद गाँधी) को अपने आंदोलन के लिए पैसे दे दें क्योंकि इससे नेताजी सुभाष चंद्र बोज, भगत सिंग आदि का बाज़ार खतम हो जाए | वास्तव में मोहनभाई ने ऐसा कार्यक्रम तैयार किया था जिसमें वो देश के आज़ादी संग्राम के कार्यकर्ताओं को व्यर्थ (टाइम पास) प्रवृति में व्यस्त रखते थे ताकि वो लोग भगत, उधम, धींगरा और सुभाष चंद्र बोस ना बन पाए और उनके नक्शों-कदम पर ना चले | और इस प्रकार अंग्रेजों को मदद की|
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हम ऐसा मानते हैं कि “इतिहास का अध्ययन करना बेकार है” और हेनरीभाई फोर्ड ने ऐसा कहा था | हम बाद में समझायेंगे कि इतिहास का अध्ययन करना क्यूँ बेकार है | उससे भी खराब है कि सभी इतिहास लिखने वाले इतिहासकार पैसे लेकर ही इतिहास लिखते हैं जैसे कि सारा मीडिया और पत्रकार पैसा लेकर ही खबर छापते हैं | सारी इतिहास की किताबें, मेरे अनुसार, ना सिर्फ गलत हैं बल्कि बडे चतुर तरीके से उनमें झूठ भरा जाता है|
इस लेख में हमारा एक सवाल है : क्यूँ अंग्रेजो ने टाटा, बिरला, बजाज और साराभाई आदि व्यापारियों को मोहनभाई को पैसे देने की इज़ाजत दी ? (मैं मोहनभाई का विरोधी हूँ, इस लिए मैं “गांधीजी” शब्द का इस्तमाल नहीं करूँगा) क्या आपके सामने यही प्रश्न पेहले कभी आया है ? क्यूँ कोई भी इतिहासकार ने पेहले कभी ये सवाल नहीं पूछा ?
मुझे सवाल विस्तृत/तफसील से करने दीजिए| इतिहासकारों का केहना है कि मोहनभाई और उनकी कंपनी (जिसको कोंग्रेस भी केहते हैं) और उनकी चरखा चलाने वाली पलटन/ब्रिगेड ने अंग्रेजो का काफी नुकसान किया था | इतिहासकारों के मुताबिक उनकी चरखा चलाने वाली पलटन/ब्रिगेड में हजारों-लाखो लोग थे जो १०० किलोमीटर प्रति घंटे के हिसाब से चरखा चलाते थे और साथ में उतने जोर से भजन गाते थे की लाउड स्पीकर की भी जरुरत नहीं पडती थी | और उनकी चरखा चलाने और भजन गाने की ताकत ने अंग्रेजो को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया-ऐसा इतिहासकार बताते हैं | उन चरखा चलाने वालों को पैसा टाटा, बिरला, बजाज, साराभाई आदि व्यापारियों से मिलता था | अब मुझे आपको एक सवाल पूछना है : यदि आप व्यापारी होते और अंग्रेज आपको कहते कि मोहनभाई को पैसा देना बंध कर दो वर्ना हम तुम्हें जेल में डाल देंगे, तो आप मोहनभाई को पैसे देने की हिम्मत करते ? में शर्त लगा कर कह सकता हूँ कि आप मोहनभाई को एक पैसा भी नहीं देते | उस समय,कोई बड़ा व्यापारी सपने में भी अंग्रेजो को मना नहीं कर सकता था या उनका विरोध कर सकता था | टाटा, बिरला, बजाज, साराभाई आदि बडे व्यापारी उस वक्त व्यापार का परवाना (लाइसन्स), व्यापार के लिए हाईटेक टेक्नोलोजी आदि के लिए अंग्रेजो पर आधीन थे | अगर वो अंग्रेजो का कहा नहीं करते तो उनका व्यापार का लाइसेंस रद्द हो जाता और उनका व्यापर बंध हो जाता और उनका दिवालिया निकल जाता | सब बात की एक बात, अंग्रेजो ने कभी भी उन व्यापारियों को मोहनभाई को पैसा देने से रोका नहीं |
अब मुझे दूसरा सवाल पूछना है : क्यूँ अंग्रेजो ने उन व्यापारियों को मोहनभाई को पैसे देने से रोका नहीं ? अगर मोहनभाई अंग्रेजो को नुकसान पंहुचा रहे थे तो सबसे अच्छा रास्ता था की उनका सप्लाई या आपूर्ति रोक दी जाये लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ | अगर आप अंग्रेजो की जगह होते तो आपको क्या फायदा होता अगर कुछ जानेमाने व्यापारी मोहनभाई को पैसा देते ?

व्यापर में या राजनीति में, दो वास्तु/चीज आवश्यक है | एक तो मुनाफा ज्यादा से ज्यादा बढ़ाना और नुकसान को कम से कम करना | क्या होता अगर मोहनभाई के पास अपने कार्यक्रम के लिए पैसे कम पड़ जाते ? तो फिर सारे आश्रम बंध हो जाते | उसके बाद लाखों कार्यकर्ता जो आज़ादी के लिए अपनी जान दे सकते थे और ले भी सकते थे ,वो रस्ते पर आ जाते और उनके लिए समय बर्बाद करने वाले कार्य/प्रवृति जेसे की चरखा चलाने और भजन गाने के लिए कोई भी जगह नहीं बचती ,क्योंकि इन कार्यों से आजादी नहीं मिलती | फिर वो लोग अपने आप सही रास्ता ढूंढने का प्रयत्न करते | क्या होता अगर उन में से ५% भी लोग अगर भगत, उधम, धींगरा या सुभाष बन जाते ? एक भगत या एक धींगरा कम से कम एक अंग्रेज को मार सकता था और अगर वो समझदारी से कोई योजना बनाते तो फिर एक भगत ४ अंग्रेज को मार सकता था | अगर १ लाख भारतीय नौजवान अगर उधम या भगत बन जाते तो ४ लाख अंग्रेजो का वध हो जाता | १९३८ में भारत में कितने अंग्रेज थे ? सिर्फ १ लाख | तो स्पष्ट बात हे की उनको भगाने के लिए सिर्फ १ लाख भारतीय काफी थे | इस लिए जाहिर सी बात हे की अगर १ लाख लोग अगर उधम, भगत, धींगरा या सुभाष बन जाते तो अंग्रेजो को भारत से भागना पड़ता |

लेकिन मोहन-भाई को जब अपने समय का व्यर्थ करने वाले कार्यक्रम करने के लिए पैसे मिले तो अंग्रेजो का नुकसान कम हो गया | कोई भी भारत का 14 से 22 वर्ष के बीच का नौजवान आज़ादी के लिए अपनी जान देने या लेने या कोई भी काम करने के लिए तैयार था |उनमें भरपूर जोश था | इसी लिए मोहनभाई ने उन नौजवान लोगो को चरखा दे दिया, उनको भजन गाने के लिए कहा, उनसे बाथरूम/शौचालय साफ करवाया और इसी तरह की बाकी समय को व्यर्थ करने वाले कार्य पांच से आठ साल तक करवाए | उसके बाद अगर एक बार नौजवान की शादी और बच्चे हो जाते ,तो वो कमजोर,सुस्त(निष्क्रिय) हो जाता और फिर बादमे अंग्रेजो के लिए कोई खतरा नहीं रहता | कुल मिलाकर, मोहनभाई के आश्रम ऐसे कारखाने थे जो भारत के लिए मर-मिटने वाले, जोशीले नौजवानों को चरखा चलाना, भजन गाना ऐसे समय का व्यर्थ करने वाली काम कराते थे जो लोग ५-१० अंग्रेज को मारने की क्षमता रखते थे | अगर उस समय यह मोहनभाई के आश्रम नहीं होते और ५% भारतीय भगत सिंग बन जाते तो यह अंग्रेज मिट्टी में मिल जाते | इसी तरह मोहनभाई के आश्रमों ने अंग्रेजो का नुकसान कम कर दिया |

लेकिन आश्रम चलाने के लिए लाखों रूपये का दान चाहिए | और खादी एक नुकसान में चलने वाला व्यापर था और आज भी है | लेकिन अंग्रेजों ने भारत के व्यापारियों को आश्रम को दान या चंदा देने की इजाजत दे दी | बल्कि मैं तो यह कहूँगा की अंग्रेजो ने भारत के व्यापारियों को मोहनभाई को चंदा देने के लिए प्रेरित किया | और वे व्यापारी भारत में व्यापार करने के लिए व्यापर के लाइसन्स, कच्चे माल और टेकनोलोजी के लिए अंग्रेजों पर निर्भर थे | तो मैं यह नतीजे पर पहुँचता हूँ कि मोहनभाई को भारतीय व्यापारियों द्वारा अंग्रेजो ने अनेक भगतों, उधम, धींगरा और सुभाषों की सप्लाई/आपूर्ति कम करने के लिए पैसे दिये |और तो और मोहनभाई ने पहले दक्षिण अफ्रीका और बाद में अपने देश के लोगों को अंग्रेजी सेना में भर्ती होने की वकालत ही नहीं, प्रचार भी किया था |

आज हम जब ये बात कर रहे हैं, तब ये इतिहास अपने आप को दोहरा भी रहा है तो भी कदाचित उसको जानने का कोई तरीका नहीं है | हम सिर्फ ये सलाह दे सकते हैं कि किसी भी नेता पर अंध-विश्वास नहीं करना चाहिए | आपको कभी पता नहीं चलेगा की आपको जो कार्य नेता द्वारा दिया गया है, वो समय की बर्बादी है या दुश्मन को हराने का तरीका | आप को सिर्फ अच्छे से निर्णय लेना होगा | लेकिन आप अगर केवल भरोसा/श्रध्धा और अंध-विश्वास से काम करेंगे ,तो देश को बचा नहीं पाएँगे |
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मोहनभाई के एक अच्छा और बड़ा नाम खड़ा किया गया था, और वो छवि/नाम पैसे देकर अखबारों के द्वारा खड़ी की गई था | मोहनभाई ने अखबार वाले को पैसे नहीं दिए लेकिन अखबार वालों को अंग्रेजो और बाक़ी व्यापारियों के द्वारा पैसे मिले | अंग्रेजो को मोहनभाई का नाम इसी लिए बड़ा करना पड़ा ताकि भगत, सुभाष आदि अन्य क्रांतिकारियों का नाम और प्रभाव कम हो जाये | मीडिया/अखबार मालिक केवल मोहनभाई-समर्थक पत्रकार को अच्छे पद देते थे और मोहनभाई-विरोधी पत्रकारों को निकाल देते थे |ऐसे अखबारों के दफ्तर में केवल मोहनभाई-समर्थक पत्रकार भर गए | ये पत्रकार सिर्फ मोहनभाई का समर्थन करने वाले लेख अखबार में छापते थे और इसी लिए अखबारों के पड़ने वालों ने यह मानना शुरू कर दिया की मोहनभाई एक अच्छे व्यक्ति और भगवान थे | लेकिन अब आप मोहनभाई के कार्यों को ध्यान से देखिये | मोहनभाई एक नियंत्रण के लिए सनकी इन्सान था जो प्रजातंत्र में नहीं मानता था और लोगो को आज़ादी पाने के लिए गलत रास्तो पर चलवाता था और उसका अच्छा नाम सिर्फ अखबारों के द्वारा खड़ा किया गया था | बंगाल में लाखों लोग मरे लेकिन ये समाचार इतना रिपोर्ट नहीं किया गया था समाचार पत्रों द्वारा, जितना मोहनभाई के उपवास को किया जाता था |

लेकिन लोगों ने ऐसे समाचार जैसे `चरखा चलाने, जोर से गाना गाने` जैसे कार्यों से आजादी मिल सकती है या मिली पर समाचार पत्रों का विश्वास कैसे किया ? लोगों के पास कोई भी मुद्दे पर दूसरे लोग क्या सोचते हैं, इसको जानने के लिए कोई साधन नहीं है | केवल मीडिया ही है लेकिन वो पक्षपाती है और अपने प्रयाजोकों के हित की बात बताता है | इसीलिए जब समाचार पत्रों ने ये बात कही कि अहिंसा से आजादी मिल सकती है या मिली , तो चाहे व्यक्ति ने स्वयं तो नहीं विश्वास किया पहले लेकिन जब समाचार पत्रों ने एक और झूठ बोला` कि लाखों-करोड़ों लोग ऐसा सोचते और मानते हैं कि `अहिंसा से आजादी मिल सकती है या मिली है, तो फिर अन्य कोई समाचार पाने के आभाव में, लोग भी सोचने लगे कि `शायद ये सही ही होगा`| इस तरह `अहिंसा से आजादी मिली` का झूठा प्रचार अभी भी चल रहा है, ताकि आम व्यक्ति दबा रहे |

लेकिन अब तीन लाइन का क़ानून, `जनता की आवाज़-पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली(सिस्टम)`(अध्याय 1 देखें www.righttorecall.info/301.h.pdf का) को हस्ताक्षर करने के लिए करोड़ों लोग मजबूर कर देते हैं, तो ये समस्या नहीं रहेगी क्योंकि इसके माध्यम से हर एक भारत के नागरिक को ये जानने की सम्भावना है कि कोई भी मुद्दे पर भारत का अन्य नागरिक क्या सोच रहा है|

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